सड़क….. दिल्ली की…..


आज दिन मैं भागते हुए मैं कॉलेज जा रही थी…. और मेरे सामने थी थी दिल्ली की दो सबसे बड़ी मुसीबतें…. पहली थी तेज बारिश  और दूसरी मुसीबत सड़क पे बने गड्ढे ….. पर हाँ , अपना हौसला खुद ही बढ़ाते हुए मैं आगे बढ़ चली…..मैं भी उन लोगो मैं से एक हूँ जो बारिश का मज़ा अपनी खिडकी से लेना पसंद करते हैं…..सोचा था आज दो दो हाथ हो ही जाये…. आखिर  कब तक मैं इस बारिश से डरती रहूंगी…???
तो फिर मैं चल पड़ी. पहले एक ऑटो वाला आया फिर दूसरा.. पर उनमे से कोई भी मोती नगर और ज़खीरा को जोड़नी वाली सड़क पे जाने को राज़ी न हुआ..बेचारे गलत भी नहीं थे..इतने सारे गड्ढों मैं गाड़ी चलाना कोई आसान कम नहीं है.. दो दिन पहले ही कॉलेज के  सामने बने स्विमिंग  पूल मैं फसकर एक ऑटो खराब हो गया था. गनीमत थी की ब्लास्ट नहीं हुआ, वर्ना आज मैं ये कहानी न सुना रही होती….
खैर आखिर मैं मुझे एक ऑटो मिल गया जो मोती नगर के मेट्रो स्टेशन  तक जाने के लिए तैयार हो गया.. फिर गड्ढों पे ब्रेक डांस करता वो ऑटो मुझे  यहाँ से वहाँ उछालता  हुआ ले जा रहा था… मैं लेट हो रही थी और एक एक सेकंड मुझ पर  भारी था… रास्ता  एक ट्रैफिक जाम से लेकर दूसरी रेड लाइट तक गाड़ियों से भरा हुआ था .. और मुझे बचपन मैं माँ की बात न मानने  का अफ़सोस था… आखिर उनका कहना की बेटा तैरना सीख लो आज काम आ जाता..
मोती नगर मेट्रो स्टेशन  पर जाकर, मुझे एक रिक्शा लेना पड़ा… पर यहाँ तो हालत और भी बुरी थी… कोई भी रिक्शा वाला मेरे कॉलेज जाने को राज़ी नहीं हुआ… बीच की सड़क इतनी टूटी हुई थी की परिंदे भी पंख बचा के उड़ते थे…. फिर भी भगवान ने मेरी सुन ली… एक रिक्शा वाला दुगने पैसो मैं चलने को तैयार हो गया…. अब एक तरफ बारिश थी, दूसरी तरफ टूटी सड़क….  और मेरे  चारो तरफ हर होर्डिंग पर लिखा था ‘ दिल्ली , कम अन प्ले’,  ‘दिल्ली चले’..कितनी कमाल की बात है, जो दिल्ली खुद ही रुक रूककर चल रही हो, वहाँ  चलकर पैरों मैं फंगल इन्फेक्शन का खतरा कौन मोल लेगा…????
हर गड्ढे पर मुझे दुनिया के सारे भगवान याद आते, अपने किये हुए सारे पापों की ऐसी सजा तो मैंने नहीं सोची थी.. सही कहते हैं स्वर्ग नर्क यही होता है…यक़ीनन नर्क तो यही होता है….
फूटपाथ पर इतना पानी भरा था की लोगो का चलना मुश्किल था…. बस लोगो को स्टॉप से बहुत पहले या बहुत बाद .मैं उतार रही थी, क्यूंकि स्टॉप पर बहुत पानी भरा था… आज मैंने एक अनोखा जाम देखा, जहाँ गाड़ियों के बीच मैं लोग भी फंसे थे.. कितनी हसीं दुनिया थी, इंसान और मशीन का कोई भेद भाव  नहीं था… सब एक सामान थे… बारिश के मारे…
रिक्शा वाला दो बार अपना संतुलन खो बैठा… घुटनों तक भरे पानी मैं वो गड्ढों का पता नहीं लगा पा रहा था…कॉलेज के सामने पहुँचते ही मैंने आस पास का नज़ारा देखा…. मुझे  फिर मेरी माँ की बातें याद आई… शायद तैरना सीख लेना चाहिए था….

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2 Comments Add yours

  1. PINTU KUMAR says:

    achha likha hai aapne.
    kuchh aise thoughts bhi likho jise padhkar dusro ko kuch sikhne ka mouka mile…….all the best.

    please ignore if you found any mistake in yhis massage.

    thanks
    Pintu
    deepak8633@gmail.com

  2. hey mr. kumar.. thanks a lot.. i have posted some new blogs. please view n leave ur valuable comments…

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