प्लास्टिक के झण्डे से मेरा भारत महान


मेरे नानाजी कहते हैं की उनके ज़माने में खादी या सूती कपडे के झण्डे फहराये जाते थे. कमाल की बात है, ऐसा ही एक झंडा मेरे स्कूल में भी था. बड़ा सा, खादी का झंडा. पर बड़ा भारी था. मेरी दिली तमन्ना थी की फिल्मो में दिखने वाले झण्डे की तरह ये भी आकाश में सर उठा के उड़ता रहता. खैर.

 

मुद्दे की बात ये है की मैंने तो बचपन से प्लास्टिक के झण्डे ही इस्तेमाल किये हैं. भाई वक्त बदला है तो वक़्त के साथ झण्डे भी बदलने चाहिए. प्लास्टिक का झंडा अपने आप में बड़ी अच्छी चीज़ है. बारिश आ जाये तो ख़राब नहीं होता. आप चाहे तो अगले साल के लिए सहेज कर भी रख सकते हैं.

 

कागज़ के झण्डे बुरे होते हैं. एक बार स्कूल में टीचर ने कहा था स्वतंत्रता दिवस के मौके पे अपनी अपनी कॉपी में भारत का झंडा बनाओ. मैंने बड़ी मेहनत से बना भी लिया. रंग भरे और पूरी कोशिश की उसे हवा में लहराता हुआ दिखाने की. मुझे गुड और एक स्टार भी मिला. पर बारिश ठहरी अनपढ़ गंवार उसे झण्डे का महत्व कहाँ पता होता है. आकर बरस गई और मेरे स्कूल बैग, कॉपी और उस झण्डे को भी सफा करके चली गई.

 

उस दिन के बाद से आज तक मैं सिर्फ प्लास्टिक का झंडा इस्तेमाल करती हूँ. क्या फायदा ऐसे झण्डे का जो बारिश आने पर राष्ट्रवाद में घुल के बह जाये. हमें ड्यूरेबल झंडा चाहिए.. आंधी तूफान बारिश कुछ भी आ जाये हम हाथ उठा कर कह सकते हैं की हमारा भारत जिंदाबाद है.

 

कही कही रेशमी से कपडे के झण्डे भी देखे है. देखने में बहुत अच्छे लगते है. ऐसा लगता है जैसे इन्डिया वाकई शाईन कर रहा है. पर समारोह ख़त्म होने के बाद जो दो  मैले से हाथ उस झण्डे को वापस तह करके अलमारी में रखने जाते  है, उससे मेरा व्यू ख़राब हो जाता है. रेशम के परदे में टाट का पैबंद भला किसे अच्छा लगता है. वो भी १५ अगस्त के दिन. आज तो सब अच्छी अच्छी बातें करते हैं, कही पार्टी होती है कही कोई प्रोग्राम. लोग शादी का जलसा समझ के आते हैं. अपने भाषणों का न्योता देकर, डकार लेकर चले जाते हैं. दूसरी ओर कुछ लोग अपनी बेबसी ओर भूख के फूल तोड़ कर झण्डे में लपेट देते हैं, ताकि नेता जी के सर पर उनका बोझ पड़े. अफ़सोस, फूलो का भी कही बोझ होता है?

 

मैं कितनी आसानी से मुद्दे से भटक जाती हूँ. बार बार गरीब, लाचार लोगो की बातें करने लगती हूँ. सच कहें तो इसमें भी मेरा ही स्वार्थ निहित है. राजनीति की बुराई करके जबतक गरीबो की हालत का दुखड़ा नहीं रो लेती तबतक कोई मुझे बुद्धिजीवियों की कतार में खड़ा करने को राज़ी नहीं होगा. कोई फर्क नहीं पड़ता की मेरे घर में कोई बाल मजदूरी करता हो या में खुद किसी गरीब की रोज़ी पे, उसके हालात पे ओर उसकी दुर्दशा पे रोज़ हज़ारो व्यंग्य करती हूँ… मैं बोल तो सकती हूँ की इनका कोई आके उद्धार करो. बस, इससे ज्यादा क्या चाहिए किसी को?

 

देखा एक बार फिर मुद्दे से भटक गई. प्लास्टिक का झंडा नाराज़ न हो जाये कही. इसलिए आपसे विनम्र निवेदन है की इस बार केवल प्लास्टिक के झण्डे का इस्तेमाल करे. पर्यावरण की सुध लेना भूल जाइये ओर एक दिन दिल खोलकर अपना समय प्लास्टिक के नाम कर दीजिये. हो सकता है की प्लास्टिक की फैक्ट्री में काम कर रहे किसी मजदूर को साहब खुश होकर बोनुस दे दें.

 

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